दिवाली (दीपावली) प्रकाश का त्यौहार है जो बुराई पर अच्छाई, अंधेरे पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म के जीत का प्रतीक है। दिवाली, हिंदुओं द्वारा बहुत उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। दिवाली, कार्तिक के हिंदू महीने की अमावस्या (पंद्रहवें दिन) पर होती है।  हालाँकि, दिवाली से कुछ दिन पहले ही  दिवाली की तैयारी शुरू हो जाती है। हर कोई इस समय अपने घरों और दफ्तरों की साफ-सफाई, नवीनीकरण और सजावट करता है। दिवाली के दिन सभी नए कपड़े पहनतें हैं। घर की महिलायें आँगन में रंगोली बनाती हैं और अपने घर के अंदर बाहर दीयों या मोमबत्तियों को प्रज्वलित करके घर रोशन करती हैं।  घर के सभी परिवारजन शाम में एक साथ माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा अर्चना करते हैं । पूजा के पश्चात प्रसाद ग्रहण कर सभी रिश्तेदार एवं परिचित मिलकर उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं। अंत में सभी जन पटाखों को जलाकर दिवाली का आनंदपूर्वक समापन करते हैं।

लेकिन प्रश्न यह है कि “लक्ष्मी और गणेश की पूजा एक साथ क्यों की जाती है?

Lakshmi Ganesh
चित्र: दिवाली में लक्ष्मी और गणेश पूजन

लक्ष्मी और गणेश की पूजा एक साथ क्यों की जाती है?

जब कलियुग शुरू हुआ, तो सभी मनुष्यों ने धन और संपत्ति को अधिक महत्व देना शुरू कर दिया था । माँ लक्ष्मी धन और धान्य की देवी हैं, और वह सभी को धन और धान्य  प्रदान करतीं हैं। कलियुग में मनुष्य की धन और धान्य की कामना बढ़ने के बाद, वह भगवान विष्णु के सामने खुद की प्रशंसा करने लगीं और दोहराती रहीं कि वह विश्व को सबसे महत्वपूर्ण वस्तु प्रदान करतीं हैं, और हर मनुष्य उनकी पूजा करता है। भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी के अहंकार को देख, उससे लक्ष्मी जी को मुक्त करने की सोची। भगवान विष्णु मुस्कुराए और शांति से कहा, “हे लक्ष्मी, सब कुछ होने या देने के बावजूद, एक महिला तब तक अधूरी है जब तक वह एक बच्चे को जन्म नहीं देती।”  लक्ष्मी जी ने अपने अहंकार का एहसास किया, लेकिन श्री हरि द्वारा बताई गई सच्चाई से अवगत होने के बाद वह अतिदुखीत हो सोचने लगी कि जबतक वह बच्चे को जन्म नहीं देंगी तबतक उन्हें पूर्णता की अनुभूति नहीं होगी।

इसी घटनाक्रम के मध्य ऋषि नारद वैकुंठ लोक पहुंचे और माता लक्ष्मी को दुखी देखा तो उनसे पूछा कि वह दुखी क्यों है जिस पर मां लक्ष्मी ने नारद जी को सब कुछ बता दिया। नारद मुनि ने सारा वृतांत सुनने के पश्चात उन्हें अपनी सबसे अच्छी मित्र पार्वती जी के पास जाने का सुझाव दिया। नारद मुनि ने लक्ष्मी माँ बोला की आप अपनी अच्छी मित्र पार्वती जी के दो पुत्रों में से एक भगवान कार्तिकेय या भगवान गणेश को गोद लेकर अपनी मातृत्व की इक्छा पूर्ण कर सकती हैं । मां लक्ष्मी ने यह सुझाव उत्कृष्ट लगा और वे अपने परम मित्र, माता पार्वती के निवास स्थान, कैलाश पर्वत गईं।

लक्ष्मी और गणेश पूजन
चित्र: दिवाली में लक्ष्मी और गणेश पूजन

माँ लक्ष्मी ने पार्वती जी से भगवान श्री गणेश को अपने पुत्र के रूप में अपनाने का अनुरोध किया परन्तु माता पार्वती जानती थीं कि लक्ष्मी जी लंबे समय तक एक स्थान पर नहीं रहती हैं और गणेश की देखभाल उचित ढंग से नहीं कर पाएंगी । मां पार्वती चिंतित हो गईं लेकिन मां लक्ष्मी ने उन्हें आश्वासन दिया की वह वह गणेश की बहुत देखभाल करेंगी। माँ पार्वती को अपने मित्र की गहरी पीड़ा की अनुभूति हुयी तो उन्होंने श्री गणेश को अपनाने की अनुमति दी।

माँ लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हो गईं और अपने गोद लिए पुत्र गणेश को आशीर्वाद दिया की श्री गणेश के प्रार्थना के बिना उनकी प्रार्थना करने वाले किसी भी भक्त को आशीर्वाद नहीं मिलेगा। माँ लक्ष्मी ने घोषित किया की गणेश ज्ञान और बुद्धि के देवता हैं जिनके बिना धन और संपत्ति का बुद्धिमानी से उपयोग नहीं किया जा सकता है। धन, संपत्ति और समृद्धि आकांक्षा रखने वाले श्रद्धालुओं को श्री गणेश की पूजा के पश्चात ही उनकी पूजा फलदायी होगी। इसलिए दिवाली पर मां लक्ष्मी और भगवान श्री गणेश की एक साथ पूजा की जाती है।